हमने आज़ाद भारत में जन्म लिया, खुली साँसें खुला आसमान ख़ुशनुमा माहौल सब कुछ तो है, लेकिन हमें ये सब उपलब्धि देने वाले लोगों ने कितना संघर्ष किया। सैकड़ों साल संघर्ष किया पीढ़ी दर पीढ़ी संघर्ष किया जूझते रहे… कैसे हासिल करे आज़ादी। स्वंय के लिये अपने आने वाले नस्लों के लिए। ग़ुलामी से मुक्ति का पाना केवल स्वयं के लिए नहीं था या केवल एक व्यक्ति के लिये सवाल नहीं था। समग्र सोच थी सबके लिए था क्या हिंदू क्या मुस्लिम या सिक्ख जैन आदि… किसी का भेद नहीं रहा होगा।लक्ष्य बड़ा था सोच बड़ी थी… अंग्रेजों के साथ साथ अपने लोग के वार को भी झेलने की दृढ़ता थी तब जाकर पायी आज़ादी। आज उनके दी हुई आज़ादी के पचहत्तर साल गुजर गये अब ज़िम्मेदारी हमारी है… इसे केवल संजोकर रखने की नहीं बल्कि उनके सपनों को साकार करने की। आज़ादी के समय की समग्रता लुप्त होने लगी है… जातिय संघर्ष छुआ-छूत भी समय समय पर देखने को मिल ही जाता है… शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सुरक्षा की शत प्रतिशत गारंटी नहीं हो पाया है अब तक। जब तक हम अपने इन दुश्मनों पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते तब तक हमारी आज़ादी पूरी तरह सार्थक नहीं है।
आइये हम आज़ादी के पचहत्तर साल पूर्ण होने के पर्व को अमृत महोत्सव के रूप में मनाते हुए प्रण लें कि सामाजिक सद्भाव बनाए रखते हुए सभी लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सुरक्षा आदि अनिवार्य रूप से हासिल कराने में पूरा सहयोग करेंगे।
जय हिन्द 🙏
No comments:
Post a Comment